छन्द-1(Chhand in Hindi)

                हिन्दी में  छन्द 

काव्य-शास्त्र के नियमानुसार जिस कविता या काव्य में मात्रा, वर्ण, गण, यति, लय आदि का विचार करके शब्द-योजना की जाती है, उसे छन्द कहते हैं। काव्य में छन्द के माध्यम से कम शब्दों में अधिकाधिक भावों की अभिव्यक्ति हो जाती है ।
लय, यति, गति, वर्ण आदि से बंधी रचना को छन्द कहते हैं ।

छन्द के निम्नलिखित अंग होते हैं 

गति - छन्द को एक प्रवाह में पढ़ा जाता है, उस प्रवाह को गति कहते हैं।
यति - पद्य पाठ करते समय जहाँ  कुछ क्षण रुका  जाता है, उसे यति कहते हैं।
तुक - पद के चरणों के अंत में समान स्वरों के प्रयोग को तुक कहा जाता है। पद्य प्रायः तुकान्त होते हैं।
मात्रा - वर्ण के उच्चारण में जो समय लगता है उसे मात्रा कहते हैं।
मात्रा दो प्रकार की होती है-लघु और गुरु। 
ह्रस्व उच्चारण वाले वर्णों की मात्रा लघु होती है तथा दीर्घ उच्चारण वाले वर्णों की मात्रा गुरु होती है। 
लघुमात्रा का मान 1 होता है और उसे खड़ी पाई (।) चिह्न से प्रदर्शित किया जाता है। 
इसी प्रकार गुरु मात्रा का मान मान 2 होता है और उसे (ऽ) चिह्न से प्रदर्शित किया जाता है।
गण - मात्राओं और वर्णों की संख्या और क्रम की सुविधा के लिये तीन वर्णों के समूह को एक गण मान लिया जाता है। गणों को आसानी से याद करने के लिए एक सूत्र बना लिया गया है- यमाताराजभानसलगा।
गणों की संख्या 8 है - 
यगण (।ऽऽ)        कहानी
 मगण (ऽऽऽ)      पांचाली
 तगण (ऽऽ।)       वागीश 
 रगण (ऽ।ऽ)       साधना 
 जगण (।ऽ।)       हरीश 
भगण (ऽ।।)        गायक 
 नगण (।।।)       नमक 
सगण (।।ऽ)       कविता
 'यमाताराजभानसलगा' सूत्र के पहले आठ वर्णों में आठ गणों के नाम हैं। अन्तिम दो वर्ण ‘लघु’ और ‘गुरु'  हैं। जिस गण की मात्राओं का स्वरूप जानना हो उसके आगे के दो अक्षरों को इस सूत्र से ले लें जैसे ‘मगण’ का स्वरूप जानने के लिए ‘मा’ तथा उसके आगे के दो अक्षर- ‘ता रा’ = मातारा (ऽऽऽ)।
‘गण’ का विचार केवल वर्ण वर्णिक छन्द में होता है मात्रिक छन्द इस बंधन से मुक्त होते हैं।
। ऽ ऽ ऽ । ऽ । । । ऽ
य मा ता रा ज भा न स ल गा
चरण/ पद/ पाद
छंद के प्रायः 4 भाग होते हैं। इनमें से प्रत्येक को 'चरण' कहते हैं। दूसरे शब्दों में छंद के चतुर्थांश (चतुर्थ भाग) को चरण कहते हैं।
कुछ छंदों में चरण तो चार होते हैं लेकिन वे लिखे दो ही पंक्तियों में जाते हैं, जैसे- दोहा, सोरठा आदि। ऐसे छंद की प्रत्येक पंक्ति को 'दल' कहते हैं।
हिन्दी में कुछ छंद छः- छः पंक्तियों (दलों) में लिखे जाते हैं, ऐसे छंद दो छंन्दों से बनते हैं, जैसे- कुण्डलिया =दोहा + रोला ।
चरण 2 प्रकार के होते हैं- सम चरण और विषम चरण। प्रथम व तृतीय चरण को विषम चरण तथा द्वितीय व चतुर्थ चरण को सम चरण कहते हैं।
वर्ण 
एक स्वर वाली ध्वनि को वर्ण कहते हैं, चाहे वह स्वर ह्रस्व हो या दीर्घ।
जिस ध्वनि में स्वर नहीं हो (जैसे हलन्त शब्द राजन् का 'न्', संयुक्ताक्षर का पहला अक्षर - कृष्ण का 'ष्') उसे वर्ण नहीं माना जाता।
वर्ण को ही अक्षर कहते हैं।
वर्ण 2 प्रकार के होते हैं-
ह्रस्व स्वर वाले वर्ण (ह्रस्व वर्ण): अ, इ, उ, ऋ, तथा इनकी मात्रा वाले शब्द |                                                        दीर्घ स्वर वाले वर्ण (दीर्घ वर्ण): आ, ई, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ तथा इनकी मात्रा वाले शब्द | 
मात्रा
किसी वर्ण या ध्वनि के उच्चारण-काल को मात्रा कहते हैं।
ह्रस्व वर्ण के उच्चारण में जो समय लगता है उसे एक मात्रा तथा दीर्घ वर्ण के उच्चारण में जो समय लगता है उसे दो मात्रा माना जाता है
मात्रा की गणना करते समय निम्न बातों का ध्यान रखना चाहिए।
 (1) अ, इ, उ, ऋ को लघु माना गया है।
 (2) आ, ई, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ आदि को गुरु माना गया है ।
 (3) संयुक्ताक्षर में यदि प्रथमाक्षर आधा हो, तो उसकी गणना नही होती है ।
 (4) संयुक्ताक्षर में अन्य अक्षर आधा होने पर पहला वर्ण यदि लघु हो तो उसे गुरु मान लिया जाता है।
 (5) अनुस्वार ( ં)और विसर्ग(:) युक्त वर्ण यदि लघु हो, तो उन्हें गुरु माना जाता है।
 (6) चन्द्र-बिंदु (ँ) के कारण लघु वर्ण गुरु नही होता ।
 (7) जिस वर्ण में रेफ (आधा 'र्') लगा हो तो उससे पहला वर्ण लघु होने पर भी गुरु हो जाता है।
 (8) हलन्त से पूर्व का वर्ण लघु होने पर भी गुरु हो जाता है।

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