पदबन्ध (PHRASE)

पदबन्ध

परिभाषा-जब एक से अधिक पद मिलकर एक व्याकरणिक इकाई का काम करते हैं, तब उस बँधी हुई इकाई को 'पदबंध' कहते हैं। जैसे-दशरथ सुत राम ने सबका मन मोह लिया।

यहाँ 'दशरथ सुत राम' पद मिलकर कर्ता कारक का कार्य संपन्न कर रहे हैं। अतः यह एक पदबंध है। 

पदबंध के भी दो उपभेद हैं।  

(क)शीर्ष पद 

(ख)आश्रित पद

 शीर्ष पद अन्य पदों का आधार या केंद्र होता है। अन्य पद उस पर आश्रित होते हैं। 

जैसे- 'दशरथ सुत राम' में 'राम' शीर्ष पद है। तथा वह 'दशरथ सुत' 'राम' पर आश्रित है।

अन्य उदाहरण

सामने एक बहुत सुंदर बच्चा खेल रहा है।

इस पदबंध में शीर्ष पद है बच्चा है। शेष पद इस पर आश्रित है। 

पद व पदबंध में अन्तर

जब कोई एक शब्द वाक्य में किसी इकाई (संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण, क्रिया, अव्यय आदि) का काम करता है तो यह पद कहलाता है। इसके विपरीत, जब एकाधिक पद (शब्द) मिलकर किसी एक संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण, क्रिया या अव्यय का काम करते हैं तो उस बंधी हुई इकाई को पदबंध कहते हैं।

पदबंध के प्रकार
पदबंध के पाँच भेद हैं

(1) संज्ञा पदबन्ध-वाक्य में संज्ञा पदों की जगह प्रयुक्त होने वाला पदबंध संज्ञा पदबंध कहलाता है।

 स्वाभाविक रूप से संज्ञा पदबंध के साथ भी संज्ञा पद की तरह कारक चिन्ह का प्रयोग होता है।

 जैसे-सामने के मकान में रहने वाला लड़का आज चला गया।

          कपिल देव सबसे अधिक विकेट लेने वाला गेंदबाज है।

         पाकिस्तान से आए हुए लोग लुधियाना गए हैं।

         देश के लिए मर मिटने वाला व्यक्ति सच्चा देशभक्त होता है।

          छत पर रहने वाला कबूतर आज दिखाई नहीं पड़ा। 

(2)सर्वनाम पदबन्ध वाक्य में सर्वनाम पद का कार्य करने वाले पदबन्ध सर्वनाम पदबंध कहलाते हैं। 

जैसे-शेर की तरह दहाड़ने वाले तुम काँप क्यों रहे हो?

       किसी की परवाह न करने वाला मैं तुझसे क्यों डरने लगा?

       इस छात्रावास में रहने वाले छात्रों में से कुछ क्रिकेट के बहुत शौकीन है।

       इतनी लगन से काम करने वाला मैं असफल नहीं हो सकता।

       सोच समझकर काम करने वाला वह गलती नहीं करेगा।

(3)विशेषण पदबन्ध जो पद संज्ञा या सर्वनाम के विशेषण के रूप में प्रयुक्त होते हैं, उन्हें विशेषण पदबंध कहा जाता है।

विशेषण पदबंध में एक विशेषण शीर्ष पद में स्थित होता है,तथा शेष पद प्रविशेषण बनकर प्रयुक्त होते हैं।

 जैसे कपिल बहुत अच्छा खिलाड़ी है। यहां बहुत अच्छा विशेषण पदबन्ध है क्योंकि यह खिलाड़ी की विशेषता प्रकट कर रहा है। अच्छा शीर्ष पद है तथा बहुत प्रविशेषण अच्छा की विशेषता बता रहा है।

 अन्य उदाहरण-सामने की दुकान पर चाय पीने वाला लड़का अपने घर चला गया।

                  सुंदर व स्वच्छ लेख लिखने वाला सोहन पुरस्कार अवश्य प्राप्त करेगा।

                        मीठे-मीठे सपने देखने वाले लोग अकर्मण्य होते हैं।

                           इस गली में सबसे बड़ा मकान यादव जी का है। 

(4) क्रिया पदबंध-एक से अधिक क्रियापद मिलकर जहां क्रिया का कार्य संपन्न करते हैं वहां क्रिया पदबंध होता है।

 जैसे-मुझे सुनाई पड़ रहा है। यहां सुनाई पड़ रहा है पदबंध क्रियापद का कार्य कर रहा है, अतः क्रियापद बंद है। अन्य उदाहरण-दिन-रात परिश्रम करने वाले सफल हो जाते हैं।

                       बालक खेल रहा है।

                       विद्यार्थी पढ़ कर सो गए हैं।

                       नाव पानी में डूबती चली गई ।

                       रेखा हर समय झाडू लगाती रहती है।

                       घोड़े मैदान में हिन-हिना रहे होंगे।

(5)क्रिया विशेषण पदबंध क्रिया विशेषण की जगह प्रयुक्त होने वाले एकाधिक पदों का समूह क्रिया विशेषण पद बंद कहलाता है।

जैसे-सोहन बहुत धीरे-धीरे बोलता है।

       यहां बहुत धीरे-धीरे क्रिया विशेषण पदबंध है। क्योंकि यह बोलना क्रिया की विशेषता बतला रहा है। इनमें धीरे-धीरे क्रिया विशेषण शीर्ष पद है तथा बहुत आश्रित पद है।

 अन्य उदाहरण-गेंद की तरह लुढ़क कर वह नीचे आ गिरा।

                         कश्मीर से कन्याकुमारी तक भारत एक है।

                          निरुपमा सब लड़कियों में सुंदर है।

                           गाड़ी बहुत देर से छूटेगी।

                          तेज दौड़ता हुआ हिरण गायब हो गया।

                          हमारा खेत इस कोने से उस कोने तक फैला है।




महाकाव्य क्या है

 महाकाव्य

काव्य के दो भेद हैं- श्रव्य काव्य और दृश्य काव्य 

श्रव्य काव्य को भी तीन भागों में विभक्त किया जा सकता है-पद्य,गद्य और चंपू काव्य

पद्य को भी फिर तीन भागों में बांट सकते हैं-महाकाव्य, खंडकाव्य, मुक्तक काव्य

श्रव्य काव्य का आशय है-ऐसा काव्य जो श्रवण इंद्रियों का रसास्वादन कराने वाला हो। महाकाव्य इसका एक भेद है।

 महाकाव्य के लक्षण निम्नानुसार है-

1.सर्गबद्ध-महाकाव्य सर्गबद्ध होना चाहिए।

2.नायक-महाकाव्य का एक नायक होना चाहिए जो देवता अथवा धीरोदात्त आदि गुणों से युक्त कोई क्षत्रिय कुलीन या एक ही वंश के अनेक कुलीन क्षत्रिय राजा भी हो सकते हैं।

3.अंगीरस-कोई एक अंगीरस होना चाहिए जो कि शृंगार अथवा वीर रस में से कोई एक रस मुख्य हो सकता है। 

4. कथावस्तु-कथावस्तु सर्वथा कवि कल्पना से उत्पन्न नहीं होनी चाहिए। या तो पौराणिक आख्यान या कथा अथवा  कोई ऐतिहासिक कथानक का विवेचन हो। 

5.पुरुषार्थ-महाकाव्य में पुरुषार्थचतुष्टय (धर्म,अर्थ,काम और मोक्ष) में से किसी एक फल की कामना का उद्देश       होना चाहिए।

6.मंगलाचरण-महाकाव्य के प्रारंभ में आशीर्वादात्मक, नमस्कारात्मक अथवा वस्तु निर्देशात्मक मंगलाचरण होना     चाहिए।

7.सज्जनों की प्रशंसा व दुष्टों की निंदा का भी विधान होना चाहिए।

8.छन्द-विधान-प्रत्येक सर्ग के कथानक को एक ही प्रकार के छंदों में होना चाहिए किंतु सर्ग के अंत में उस छन्द     को बदल दिया जाना चाहिए।

 9.सर्ग-संख्या-सर्ग न तो अत्यंत छोटे और न बहुत ही बड़े होने चाहिए। उनकी संख्या भी आठ से अधिक होनी चाहिए।

10.किसी सर्ग में अनेक विधि छंदों का भी विधान हो सकता है।

11.अग्रिम-कथा संसूचन-सर्ग की समाप्ति पर अगले सर्ग की कथा का भी संसूचन होना चाहिए।

12.विषद-वर्णन-सर्ग में कथानकानुसार संध्या,सूर्योदय,चंद्रोदय,रात्रि,प्रदोष,अंधकार,दिन,प्रातः-काल,मध्यान्ह-काल,शिकार,पर्वत, ऋतु,वन,समुद्र,संयोग,वियोग,मुनि,स्वर्ग,नरक,मार्ग,युद्धार्थ गमन,अभ्युदय,विजय,जल-क्रीड़ा, वनविहार,विवाह,पुत्र जन्मोत्सव आदि विभिन्न विषयों का यथा स्थान वर्णन होना चाहिए।

13.सर्ग का नामकरण-कवि द्वारा निबद्ध छन्द के अनुसार अथवा नायक के गुणों के अनुसार या फिर सर्ग की कथा के अनुकूल प्रत्येक सर्ग का नामकरण करना चाहिए।

14.महाकाव्य के लेखन का उद्देश्य-धर्म तथा न्याय की विजय तथा अधर्म व अन्याय की पराजय महाकाव्यका लेखन उद्देश्य होना चाहिए।

 उपरोक्त वर्णित बिन्दु सभी महाकाव्यों के सामान्य लक्षण हैं। कवि को महाकाव्य लेखन के समय उनके प्रयोग का ध्यान रखना चाहिए।

मैथिलीशरण गुप्त

 मैथिलीशरण गुप्त जी का जन्म सन1886 ईस्वी में झाँसी के चिरगाँव में हुआ। ये द्विवेदी युग के सर्वाधिक लोकप्रिय कवि थे। आरम्भ में इनकी रचनायें कलकत्ता से छपने वाले 'वैश्योपकारक' पत्रिका में छपती थी। बाद में इनका परिचय आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी से हुआ और इनकी कवितायेँ 'सरस्वती' पत्रिका में छपने लगी। द्विवेदी जी गुप्त जी के काव्य-गुरु थे। द्विवेदी जी के आदेश और उपदेश तथा स्नेहमय प्रोत्साहन के परिणामस्वरूप इनकी काव्य-कला में निखार आया उन्हें साहित्य जगत में 'दद्दा' के नाम से भी जाना जाता है

उनकी देशभक्ति से ओत-प्रोत रचनाओं के कारण उन्हें महात्मागांधी ने 'राष्ट्रकवि' की उपाधि प्रदान की। उनकी जयन्ती 3 अगस्त को 'कवि-दिवस' के रूप में प्रतिवर्ष मनाया जाता है। भारत सरकार द्वारा 1954 ईस्वी में आपको 'पद्मभूषण' से सम्मानित किया गया। इनकी ख्याति का मूलाधार 'भारत-भारती' (1912) ने हिन्दी भाषियों में देश के प्रति भक्ति और गर्व की भावनायें जाग्रत की

गुप्त जी की रचनायें

गुप्त जी मूलतः प्रबंधकार थे। उन्होंने निम्न ग्रन्थों की रचना की

महाकाव्य- साकेत और यशोधरा 

खंडकाव्य- जयद्रथ वध, भारत-भारती, पंचवटी, द्वापर, सिद्धराज, नहुष, अंजलि और अर्ध्य, अजित, अर्जन और विसर्जन, काबा और कर्बला, किसान, कुणाल गीत, गुरु तेग बहादुर, गुरुकुल, जय भारत, युद्ध, झंकार, पृथ्वीपुत्र, वक संहार, शकुन्तला, विश्व-वेदना, विष्णु-प्रिया, उर्मिला, लीला, प्रदक्षिणा, दिवोदास तथा भूमि-भाग आदि प्रमुख हैं

नाटक 

गुप्त जी ने रंग में भंग, राजा-प्रजा, वन वैभव, विकट-भट, विरहिणी, वैतालिक, शक्ति, सैरन्ध्री, स्वदेश-संगीत, हिडिम्बा, हिन्दू, चन्द्रहास आदि प्रसिद्ध नाटक लिखे

12 दिसम्बर 1964 ईस्वी को 78 वर्ष की आयु में इनका स्वर्गवास हो गया


जयशंकर प्रसाद


 जयशंकर प्रसाद का जन्म काशी के गोविन्दसराय में प्रसिद्द 'सुंघनी साहू' परिवार में बाबू देवीप्रसाद जी के यहाँ 30 जनवरी 1890 को हुआ। इनके पितामह बाबू शिवरतन साहू गरीबों को दान देने में प्रसिद्ध थे। इन्होनें आठवीं तक विद्यालयी शिक्षा के बाद घर पर ही संस्कृत, हिन्दी, उर्दु, और अंग्रेजी भाषाओँ का गहन अध्ययन किया।

जब प्रसाद जी लगभग 11 वर्ष के थे तो सन 1900 में उनके पिता का देहान्त हो गया। जब वे 15 वर्ष के थे तो उनकी माता मुन्नीदेवी का भी स्वर्गवास हो गया। 17 वर्ष की अवस्था में बड़े भाई के निधन के बाद उन पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा और समस्त घर परिवार की जिम्मेदारी प्रसाद जी पर आ पडी।

प्रसाद जी का पहला विवाह 1907 ईस्वी में विन्ध्यवासिनी देवी के साथ हुआ। क्षय रोग के कारण 1916 ईस्वी में उनका निधन हो गया। पश्चात् 1917 ईस्वी में उनका दूसरा विवाह सरस्वती देवी के साथ हुआ। क्षय रोग के कारण ही दो वर्ष बाद उनका भी देहान्त हो गया। 1919 ईस्वी में इनका तीसरा विवाह कमलादेवी के साथ हुआ।इनका एक मात्र पुत्र रत्नशंकर प्रसाद तीसरी पत्नी की ही संतान थे।

क्षय रोग ने उनका जीवन काफी कष्टमय बनाया। और इसी व्याधि से 47 वर्ष की आयु में 1937 ईस्वी में उनका स्वर्गवास हो गया।

रचनायें 

जयशंकर प्रसाद प्रसिद्द हिन्दी कवि, नाटककार,कहानीकार,उपन्यासकार तथा निबन्ध लेखक थे उन जैसी प्रतिभाओं का अवतरण धरती पर एकाधबार ही होता है।उन्होंने अपनी काव्य-यात्रा ब्रजभाषा से आरम्भ की और धीरे-धीरे खड़ी बोली को अपनाते हुये इस तरह अग्रसर हुये कि युग प्रवर्तक कवि के रूप में प्रतिष्ठित हुये। जब वे नौ वर्ष के थे उन्होंने कलाधर के नाम से ब्रजभाषा में सवैया नाम से अपने गुरु रसमय सिद्ध को दिखाये थे,जिनसे गुरूजी बहुत प्रभावित हुये। कवि होने के साथ-साथ प्रसाद जी प्रसाद जी गंभीर चिन्तक भी थे।उनके काव्य में छायावाद की स्पष्ट झलक मिलती है वे छायावाद के चार प्रमुख स्तम्भों में से एक थे।

प्रसाद जी की प्रमुख रचनायें निम्नानुसार हैं-

कामायनी

कामायनी महाकाव्य प्रसाद जी की अक्षय कीर्ति का स्तम्भ है। भाषा,शैली और विषय-वस्तु तीनों की ही दृष्टि से यह विश्व साहित्य का अनुपम काव्य है।कामायनी में प्रसाद जी ने प्रतीकात्मक पात्रों के द्वारा मानव के मनोवैज्ञानिक विकास को प्रस्तुत किया है तथा मानव जीवन में श्रद्धा और बुद्धि के समन्वित जीवन दर्शन को प्रतिष्ठा प्रदान की है।

आँसू

आँसू कवि के मर्मस्पर्शी वियोगपरकउद्गारों का प्रदर्शन है।

लहर

यह मुक्तक रचनाओं का संग्रह है।

झरना

प्रसाद जी की छायावादी शैली में रचित कवितायेँ इसमें संकलित हैं।

चित्राधार

चित्राधार प्रसाद जी की ब्रज में रची गई कविताओं का संग्रह है।

नाटक 

नाटक लेखन में प्रसाद जी का बहुत महत्वपूर्ण स्थान है। इनके प्रमुख नाटक  चन्द्रगुप्त,ध्रुवस्वामिनी,स्कन्दगुप्त,जनमेजयका नागयग्य, एक घूँट, विशाख,अजातशत्रु आदि हैं।

कहानी संग्रह 

प्रतिध्वनि,छाया,आकाशदीप,आँधी तथा इन्द्रजाल आदि इनके प्रसिद्ध कहानी संग्रह है।

उपन्यास

तितली और कंकाल 

निबन्ध 

काव्य और कला 

तुलसीदास की समन्वय भावना

कवि नागार्जुनके गाँव में 

अत: हम कह सकते हैं,कि जयशंकर प्रसाद जी हिन्दी साहित्य जगत के एक जाने माने हस्ताक्षर थे। उनका अल्पायु में संसार से जाना हिन्दी साहित्य जगत के लिये अपूरणीय क्षति है।

 


मुंशी प्रेमचन्द

 उपन्यास सम्राट :मुंशी प्रेमचन्द

हिन्दी साहित्य जगत में उपन्यास सम्राट के नाम से प्रसिद्ध मुंशी प्रेमचंद का जन्म 31जुलाई 1980 ईस्वी में उत्तरप्रदेश राज्य के वाराणसी जिले के 'लमही' गाँव में पिता मुंशी अजायबराय और आनन्दी देवी के घर में हुआ।

प्रेमचन्द के बचपन का नाम धनपत राय श्रीवास्तव था।प्रेमचन्द जी की प्रारम्भिक शिक्षा फारसी भाषा में हुई।जब वे सात वर्ष के थे,तभी उनकी माता का स्वर्गवास हो गया।सोलह वर्ष की आयु होने पर पिता का देहान्त हो गया। इसके कारण उनका प्रारम्भिक जीवन संघर्षमय रहा। इसके बावजूद उन्होंने स्नातक तक पढाई की।

मैट्रिक की पढाई के बाद प्रेमचन्द जी एक स्थानीय विद्यालय में शिक्षक नियुक्त हो गये। बी.ए. पास करने के बाद वे शिक्षा विभाग में इंस्पेक्टर नियुक्त हो गये। लेकिन भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन में 1921 में 'असहयोग आन्दोलन' के कारण गाँधी जी के आव्हान पर उन्होंने अपने पद से त्याग-पत्र दे दिया और साहित्य लेखन को अपना व्यवसाय बना लिया।इन्होंने अपने लेखन की शुरुआत उर्दू से की, उर्दू में प्रेमचन्द जी ने नबाबराय के नाम से लिखा।इनका सोजेवतन नामक कहानी संग्रह उर्दू में छपा जो अंग्रेज सरकार को काँटे की तरह चुभा, अंग्रेज सरकार के कोपभाजन से बचने के लिये इन्होनें हिन्दी में 'प्रेमचन्द' नाम से लिखना शुरू किया। हिन्दी में ये बाद में आये किन्तु जब आये तो कथा साहित्य में धूम मचा दी।

इनका जीवनकाल 1881 से 1936 ईस्वी तक रहा।

रचनायें 

प्रेमचन्द जी को उपन्यास सम्राट कहा जाता है। उनके लिखे उपन्यासों ने हिन्दी जगत में तहलका मचा दिया।उनके लिखे उपन्यासों को हम तीन श्रेणियों में बाँट सकते हैं-(1) पहली श्रेणी के उपन्यास प्रारम्भकाल के हैंइनमें उपन्यासकार के व्यक्तित्व की आरम्भिक झाँकी मिलती है। ये उपन्यास हैं- प्रतिज्ञा, वरदान आदि।

(2) दूसरी श्रेणी की रचनाओं में सामाजिक समस्याओं को प्रधानता दी गई। सेवा-सदन में दहेज़ प्रथानिर्मला में वृद्धावस्था में दूसरा विवाह, शंका और अविश्वास के दुष्परिणाम, तथा गबन में आभूषणों की लालसा और उसके दुष्परिणामों को दिखाया गया है। (3) तीसरी श्रेणी की औपन्यासिक रचनाओं में प्रेमचन्द जीवन के एक अंश के नहीं अपितु सम्पूर्ण जीवन के द्रष्टा है। रंगभूमि, कायाकल्प, कर्मभूमि में उस समय चल रहे राजनैतिक आन्दोलन और समाज-सुधार की झलक मिलती है। प्रेमाश्रम में जमीदारी प्रथा में श्रमिक का शोषण वर्णित है।

गोदान प्रेमचन्द जी की सर्वाधिक लोकप्रिय कृति है। जमीदारों और सूदखोरों के द्वारा शोषित किसान अपने परिवार की प्रतिष्ठा को बनाये रखने के लिये किस प्रकार संघर्ष करता हुआ अपने जीवन की बलि दे देता है,इसका मार्मिक चित्रण इस उपन्यास में किया गया है।

कहानी संग्रह 

इनकी अधिकतर कहानियों में निम्न व मध्यम वर्ग का चित्रण है। कमल किशोर गोयनका के अनुसार प्रेमचन्द जी ने 301 कहानियाँ लिखी हैं। 

इनके कहानी संग्रह सप्त-सरोज

प्रेमपूर्णिमा 

प्रेम-पचीसी 

प्रेम प्रतिमा 

प्रेम द्वादशी

समरयात्रा 

मानसरोवर आदि हैं।

नाटक

प्रेमचन्द जी ने संग्राम, कर्बला और प्रेम की वेदी आदि नाटक लिखे।

अत: हम कह सकते हैं,कि प्रेमचन्द जी का हिन्दी जगत को योगदान अतुलनीय है।

 

आधुनिक हिंदी साहित्य के जनक:भारतेन्दु हरिश्चन्द्र

 भारतेन्दु हरिश्चन्द्र 

भारतेन्दु हरिश्चन्द्र आधुनिक हिन्दी साहित्य के पितामह माने जाते हैं।इनका वास्तविक नाम हरिश्चन्द्र था। भारतेन्दु इनकी उपाधि थी।
भारतेन्दु हरिश्चन्द्र का जन्म 9 सितम्बर 1850 ईस्वी में वाराणसी के वैश्य परिवार में हुआ। इनके पिता का नाम 'गोपाल चन्द्र' था। हरिश्चन्द्र इतिहास प्रसिद्ध सेठ अमीचंद की वंश परम्परा में पैदा हुये। इनके पिता भी एक जाने-माने कवि थे जिन्होंने 40 ग्रंथों की रचना की। ये जब 5 वर्ष के थे तभी इनकी माता 'पार्वतीदेवी' का निधन हो गया।
इनके द्वारा रचित कुल 68 रचनायें उपलब्ध हैं। श्रेष्ठ काव्य सृजन के कारण 1880 ईस्वी में इन्हें 'भारतेन्दु' की उपाधि प्रदान की गई।
कवि होने  के साथ-साथ भारतेन्दु पत्रकार भी थे। उनके द्वारा प्रसिद्ध 'कविवचन सुधा' और 'हरिश्चंद्र चन्द्रिका' नामक पत्रिकाएं प्रकाशित की जाती थी।

प्रमुख रचनायें 

भारतेन्दु हरिश्चंद्र के काव्य की विषय-वस्तु को हम निम्नानुसार विभाजित कर सकते हैं-

नाटक- 

हरिश्चन्द्र जी ने 'वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति','सत्य-हरिश्चंद्र', 'भारत दुर्दशा', अंधेर नगरी, श्री चन्द्रावली, नीलदेवी, प्रेम जोगिनी, सती प्रताप आदि प्रसिद्ध नाटकों की रचना की।

उपरोक्त के साथ उन्होंने विद्यासुंदर,पाखण्ड विडंबन, धनञ्जय विजय, कर्पूर मंजरी, भारत जननी, मुद्राराक्षस, दुर्लभ बन्धु, आदि नाटकों का अन्य भाषाओँ से हिन्दी में अनुवाद किया।

निबन्ध-संग्रह-

 हरिश्चन्द्र जी के प्रमुख निबन्ध: नाटक,कालचक्र,लेवी प्राण लेवी,भारतवर्षोंन्नति कैसे हो सकती है?, कश्मीर कुसुम,जातीय संगीत,संगीत सार,हिन्दी भाषा,स्वर्ग में विचार सभा आदि हैं।

काव्य रचनायें-

 भारतेन्दु जी की काव्य रचना-भक्त सर्वस्व,प्रेम मालिका,प्रेम माधुरी,प्रेम तरंग,उत्तरार्द्ध भक्तमाल,प्रेम-प्रलाप,होली,मधु-मुकुल,राग-संग्रह,वर्षा विनोद,विनय प्रेम पचासा,फूलों का गुच्छा,प्रेम फुलवारी,कृष्णचरित्र,दानलीला,तन्मय लीला,नये जमाने की मुकरी,सुमनांजलि,बन्दरसभा,बकरी विलाप आदि प्रमुख हैं।

कहानी

अद्भुत अपूर्व स्वप्न 

यात्रा वृतान्त

सरयूपार की यात्रा 

लखनऊ

आत्मकथा 

एक कहानी-कुछ आप बीती कुछ जगबीती

उपन्यास

पूर्णप्रकाश

चन्द्रप्रभा

 

 

 

 


काव्य-गुण